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SHIV CHALISA
शिव चालीसा
२१ चौपाइयां|२ दोहा|हिंदी
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॥ दोहा ॥
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥
॥ चौपाई ॥
01
जय गिरिजापति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥
02
अंग गौर शिर गंग बहाए। मुण्डमाल तन क्षार लगाए॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देख नाग मन मोहे॥
03
मैना मातु की हवे दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
04
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल है जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥
05
देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुःख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
06
तुरत षडानन आप पठायउ। लव निमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
07
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥
08
दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥
09
प्रगट उदधि मन्थन में ज्वाला। जरत सुरासुर भए विहाला॥
किन्ह दया तहँ करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥
10
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा। जीत के लंका विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
ॐ नमः शिवाय
11
एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
12
जय जय जय अनन्त अविनाशी। करत कृपा सब के घट वासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै। भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै॥
13
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। येहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥
14
मात-पिता भ्राता सब होई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु प्रभु संकट भारी॥
15
धन निर्धन को देत सदाहीं। जो कोई जाँचे सो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
16
शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। शारद नारद शीश नवावैं॥
17
नमो नमो जय नमो शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत है शम्भु सहाई॥
18
ऋनिया जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र हीन इच्छा करे कोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
19
पंडित त्रयोदशी को लावे। ध्यान-पूर्वक होम करावे॥
त्रयोदशी व्रत करे हमेशा। ता के तन नहिं रहे कलेशा॥
20
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म-जन्म के पाप नसावे। अन्तवास शिवपुर में पावे॥
21
कहे अयोध्यादास आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥
॥ दोहा ॥
नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करो चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीशा॥
मगसर छठि हेमन्त ऋतु, सम्वत् चौसठ जान।
अस्तुति चालीसा शिवहिं, पूर्ण कीन कल्यान॥
ॐ नमः शिव शंकराय ॐ
फल: शम्भु शंकर की महिमा अपार है। जो भी भक्त श्रद्धापूर्वक प्रतिदिन शिव चालीसा का पाठ करता है उसके सभी दुःख और कष्ट दूर होते हैं। भगवान शिव की कृपा से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है एवं आत्मा को शांति मिलती है।