॥ दोहा ॥
जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥
॥ चौपाई ॥
01जय जय जय गणपति गणराजू।
मंगल भरण करण शुभ काजू॥
02जय गजबदन सदन सुखदाता।
विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥
03वक्र तुण्ड शुची शुण्ड सुहावन।
तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥
🪷 जय गणेश 🪷
04राजत मणि मुक्तन उर माला।
स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥
05पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं।
मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥
06सुन्दर पीताम्बर तन साजित।
चरण पादुका मुनि मन राजित॥
07धनि शिव सुवन षडानन भ्राता।
गौरी लालन विश्व-विख्याता॥
08ऋद्धि सिद्धि तव चँवर सुधारे।
मूषक वाहन सोहत द्वारे॥
विघ्नहर्ता
09कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी।
अति शुची पावन मंगलकारी॥
10एक समय गिरिराज कुमारी।
पुत्र हेतु तप कीन्ह भारी॥
11भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।
तब पहुँच्यो तुम धरि द्विज रूपा॥
12अतिथि जानि कैं गौरि सुखारी।
बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥
13अति प्रसन्न ह्वैं तुम वर दीन्ह।
मातु पुत्र हित जो तप कीन्ह॥
🪷
14मिलही पुत्र तुहि बुद्धि विशाला।
बिना गर्भ धारण यहि काला॥
15गणनायक गुण ज्ञान निधाना।
पूजित प्रथम रूप भगवाना॥
16अस कहि अन्तर्धान रूप ह्वैं।
पल में गणपति तहाँ प्रगट भयऊ॥
17अति अद्भुत रूप सोहि देखा।
गौरी मन जाहि गयऊ रेखा॥
18हर्षित ह्वैं गौरी पुत्र रूप निहारा।
नयन भरे अश्रु मन हर्षाया॥
जय गणपति
19सतयुग त्रेता द्वापर काला।
नाम ले तुम्हारो मिटे जंजाला॥
20पूजन रचाय धर्म अनुसारा।
सब विघ्नों का तुम करो निवारा॥
21कलियुग में नाम तुम्हारा।
सहसगुण फल मिलत न्यारा॥
22श्री गणेश यही नाम तुम्हारा।
अति सुन्दर लागत मन प्यारा॥
23सुन्दर रूप मनोहर धारी।
मात-पिता तुम पर बलिहारी॥
🪷
24तुम्हारी महिमा पार न पाई।
जो जन सुमिरत चित्त लगाई॥
25शिव-सुवन षडानन के भ्राता।
जगत जनों के सुख के दाता॥
26विद्यावारिधि बुद्धि के दाता।
धन-धान्य देत हो विख्याता॥
27मूषक वाहन पर तुम राजत।
सुर-नर मुनि सब दर्शन पाजत॥
28कबहुँ न तुमने भक्त भुलाया।
सदा ही उनको हाथ बँधाया॥
विघ्नविनाशक
29भक्त कार्य सब सिद्ध कराते।
जो तुमको सुमिरत मन लाते॥
30और देव को नहिं धरत ध्याना।
जो गणेश का जपत हो नामा॥
31सब कामना पूर्ण हो जाती।
जब कृपा तुम्हारी होती साथी॥
32संकट काटे विघ्न हरो।
जो ध्यावे तुम सुमिरे सुखी करो॥
33पूजन करे जो श्रद्धा लाई।
सबही सिद्धि मनोरथ पाई॥
🪷
34शुभ लाभ लिखत दाहिने पासा।
भक्तजनों की पूरण आसा॥
35जो गणेश चालीसा नित गावे।
बसी इच्छा मन की वो पावे॥
36सेवक स्तुति करे हर्षाई।
ऋद्धि-सिद्धि घर आवत भाई॥
37विद्यार्थी जो पाठ करत है।
ज्ञान पाय परीक्षा जीतत है॥
38व्यापारी जो नाम रटत है।
लक्ष्मी आवे द्वार खटत है॥
🪷 ॐ गं गणपतये नमः 🪷
39और जो यह चालीसा गावे।
छूट बन्धन सुख परम पावे॥
40सुमिरन करे गणेश का नित्य।
हरे दुःख बाधा अनित्य॥
॥ दोहा ॥
जो यह गणेश चालीसा पढ़े, ध्यान धरे मन माहि।
सकल सिद्धि संपत्ति मिलें, सुख-दुख रहें नाहिं॥
॥ जय गणेश — ॐ गं गणपतये नमः ॥
🪷 फल: गणेश चालीसा का पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल करने से सभी विघ्न दूर होते हैं, बुद्धि और विद्या की प्राप्ति होती है, कार्यों में सफलता मिलती है। कोई भी शुभ कार्य आरंभ करने से पहले गणपति का स्मरण अवश्य करें।
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