कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में दोनों सेनाओं को देखकर अर्जुन के मन में अपने बन्धु-बान्धवों के प्रति मोह उत्पन्न हो गया। वे युद्ध करने में असमर्थ होकर रथ में बैठ गये और उनके हाथ से गाण्डीव धनुष गिर गया।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति॥
हे कृष्ण! अपने इन युद्ध करने की इच्छा वाले सम्बन्धियों को सामने देखकर मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूखता जा रहा है।
महाभारत के युद्ध के प्रारम्भ में धृतराष्ट्र ने संजय से युद्ध का वृत्तान्त पूछा। संजय ने बताया कि कुरुक्षेत्र में दोनों सेनाएँ युद्ध के लिए तैयार खड़ी हैं। दुर्योधन ने अपने गुरु द्रोणाचार्य को दोनों सेनाओं के वीरों का परिचय दिया।
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के कहने पर अपना रथ दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा किया। अर्जुन ने जब दोनों ओर अपने पितामह, गुरु, मामा, भाई, पुत्र, मित्र आदि युद्ध करने के लिए उपस्थित देखे, तो उनका मन करुणा से भर गया। उन्होंने सोचा — यदि मैं इन्हें मार दूँगा तो मुझे क्या प्राप्त होगा? राज्य और सुखों का क्या लाभ?
अर्जुन का शरीर शिथिल पड़ गया, हाथ से धनुष छूट गया, मन विचलित हो गया। वे रथ में बैठ गये और कहने लगे — "मैं युद्ध नहीं करूँगा।" यही इस अध्याय का मुख्य विषय है — मोह और विषाद, जो सम्पूर्ण गीता के उपदेश का कारण बने।
यह प्रथम अध्याय सम्पूर्ण गीता का प्रवेशद्वार है। अर्जुन का विषाद ही भगवान के उपदेश का कारण बना। इसे "विषाद योग" इसलिए कहते हैं कि कभी-कभी विषाद भी योग का प्रारम्भ होता है।
मोह और विषाद जब चरम पर पहुँचते हैं, तभी साधक सच्चे ज्ञान के लिए तैयार होता है। अर्जुन का विषाद नकारात्मक नहीं, वरन् आध्यात्मिक जागरण की पूर्व-अवस्था है।