Shrimad Bhagavad Gita

श्रीमद् भगवद्गीता

The Song of God

18 अध्याय|700 श्लोक|श्रीकृष्ण|वेदव्यास
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यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

"Whenever dharma declines and adharma rises, O Bharata, I manifest myself." — Lord Krishna

— श्रीमद् भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक ७

18अध्याय
700श्लोक
3मुख्य योग
5000+वर्ष प्राचीन
दिव्य ज्ञान
ग्रन्थ का भाग
महाभारत, भीष्म पर्व (अध्याय २५–४२)
संकलनकर्ता
महर्षि वेदव्यास
रचयिता / वक्ता
भगवान श्रीकृष्ण — अर्जुन को
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सम्पूर्ण अध्याय

अठारह अध्याय — विस्तृत विवरण

All 18 chapters of the Bhagavad Gita with Hindi summaries, key shlokas, and core teachings

कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में दोनों सेनाओं को देखकर अर्जुन के मन में अपने बन्धु-बान्धवों के प्रति मोह उत्पन्न हो गया। वे युद्ध करने में असमर्थ होकर रथ में बैठ गये और उनके हाथ से गाण्डीव धनुष गिर गया।
श्लोक४७ श्लोक
वक्तासंजय + अर्जुन
मुख्य विषयमोह, विषाद
स्थानकुरुक्षेत्र
प्रमुख श्लोक
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति॥

हे कृष्ण! अपने इन युद्ध करने की इच्छा वाले सम्बन्धियों को सामने देखकर मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूखता जा रहा है।

— गीता १.२८
अध्याय का विस्तृत विवरण

महाभारत के युद्ध के प्रारम्भ में धृतराष्ट्र ने संजय से युद्ध का वृत्तान्त पूछा। संजय ने बताया कि कुरुक्षेत्र में दोनों सेनाएँ युद्ध के लिए तैयार खड़ी हैं। दुर्योधन ने अपने गुरु द्रोणाचार्य को दोनों सेनाओं के वीरों का परिचय दिया।

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के कहने पर अपना रथ दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा किया। अर्जुन ने जब दोनों ओर अपने पितामह, गुरु, मामा, भाई, पुत्र, मित्र आदि युद्ध करने के लिए उपस्थित देखे, तो उनका मन करुणा से भर गया। उन्होंने सोचा — यदि मैं इन्हें मार दूँगा तो मुझे क्या प्राप्त होगा? राज्य और सुखों का क्या लाभ?

अर्जुन का शरीर शिथिल पड़ गया, हाथ से धनुष छूट गया, मन विचलित हो गया। वे रथ में बैठ गये और कहने लगे — "मैं युद्ध नहीं करूँगा।" यही इस अध्याय का मुख्य विषय है — मोह और विषाद, जो सम्पूर्ण गीता के उपदेश का कारण बने।

मुख्य विषय-बिन्दु
कुरुक्षेत्र का वर्णन दोनों सेनाओं का परिचय अर्जुन का मोह युद्ध से विमुखता गाण्डीव का गिरना
क्या आप जानते हैं?

यह प्रथम अध्याय सम्पूर्ण गीता का प्रवेशद्वार है। अर्जुन का विषाद ही भगवान के उपदेश का कारण बना। इसे "विषाद योग" इसलिए कहते हैं कि कभी-कभी विषाद भी योग का प्रारम्भ होता है।

मुख्य शिक्षा

मोह और विषाद जब चरम पर पहुँचते हैं, तभी साधक सच्चे ज्ञान के लिए तैयार होता है। अर्जुन का विषाद नकारात्मक नहीं, वरन् आध्यात्मिक जागरण की पूर्व-अवस्था है।

यह अध्याय गीता का सार है। भगवान ने यहाँ आत्मा की अमरता, सांख्य दर्शन, कर्मयोग और स्थितप्रज्ञ के लक्षणों का वर्णन किया। सम्पूर्ण गीता का बीज इसी अध्याय में है।
श्लोक७२ श्लोक
वक्ताश्रीकृष्ण
मुख्य विषयआत्मतत्व, कर्म
विशेषगीता का हृदय
प्रमुख श्लोक
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥

आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल गीला नहीं कर सकता और वायु सुखा नहीं सकती। आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल और सनातन है।

— गीता २.२३
अध्याय का विस्तृत विवरण

भगवान श्रीकृष्ण ने सर्वप्रथम अर्जुन को आत्मा की अमरता का ज्ञान दिया। उन्होंने कहा — "यह आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के नाश होने पर भी यह नष्ट नहीं होती।" जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्र उतारकर नये वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है।

इसके पश्चात् भगवान ने कर्मयोग का उपदेश दिया — "कर्म करो, फल की चिन्ता मत करो।" यही गीता का सबसे प्रसिद्ध सन्देश है। साथ ही उन्होंने स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताये — वह व्यक्ति जो दुःख में शोक नहीं करता, सुख में लिप्त नहीं होता, राग-भय-क्रोध से मुक्त है।

मुख्य विषय-बिन्दु
आत्मा की अमरतासांख्य दर्शनकर्मयोग का बीजस्थितप्रज्ञ के लक्षणबुद्धियोग
क्या आप जानते हैं?

यह अध्याय सबसे लम्बे अध्यायों में से एक है (७२ श्लोक) और इसे गीता का "सार-संग्रह" कहा जाता है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि केवल दूसरे अध्याय को पढ़ लेना ही सम्पूर्ण गीता को समझने के समान है।

मुख्य शिक्षा

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। — कर्म पर तुम्हारा अधिकार है, फल पर नहीं। फल की आसक्ति छोड़कर अपना कर्तव्य करो — यही सच्चा योग है।

कर्म योग — बिना फल की इच्छा किये अपना कर्तव्य करना। भगवान ने यहाँ यज्ञ, लोकसंग्रह और काम-क्रोध जैसे महाशत्रुओं का वर्णन किया।
श्लोक४३ श्लोक
मुख्य विषयनिष्काम कर्म
आदर्शलोकसंग्रह
शत्रुकाम-क्रोध
प्रमुख श्लोक
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥

तू नियत कर्म कर। कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेयस्कर है। कर्म के बिना तेरा शरीर-निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा।

— गीता ३.८

भगवान ने यहाँ बताया कि मनुष्य एक पल भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता। इसलिए कर्म त्यागने की बात नहीं, बल्कि फल की आसक्ति छोड़कर कर्म करना ही कर्मयोग है। जो व्यक्ति समाज के हित में कर्म करता है, वह ईश्वर की भक्ति ही करता है।

भगवान ने काम और क्रोध को इन्द्रियों, मन और बुद्धि में बसे महाशत्रु बताया। ये ज्ञान को ढक लेते हैं और मनुष्य को पतन की ओर ले जाते हैं। इन्हें जीतने से ही सच्चा कर्मयोगी बन सकते हैं।

मुख्य विषय-बिन्दु
निष्काम कर्मयज्ञ-भावनालोकसंग्रहकाम-क्रोध से मुक्तिस्वधर्म
मुख्य शिक्षा

कर्म ही जीवन है — परन्तु कर्म यज्ञ की भावना से होना चाहिए। समाज के हित में, ईश्वर को समर्पित कर्म करना ही सच्चा धर्म है।

भगवान ने अवतार का रहस्य बताया। जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब वे प्रकट होते हैं। साथ ही ज्ञान-यज्ञ की महिमा और गुरु की आवश्यकता बतायी।
श्लोक४२ श्लोक
मुख्य विषयअवतार-रहस्य
विशेषज्ञान-यज्ञ
गुरुसेवा-श्रद्धा
प्रमुख श्लोक
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

हे भारत! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।

— गीता ४.७

भगवान ने बताया कि यह ज्ञान सर्वप्रथम उन्होंने सूर्य को, सूर्य ने मनु को और मनु ने इक्ष्वाकु को दिया था। समय के साथ यह विलुप्त हो गया, इसलिए अब वे अर्जुन को दे रहे हैं। यही परम्परा-प्राप्त ज्ञान की महिमा है।

भगवान ने ज्ञान-यज्ञ को सर्वोत्तम यज्ञ बताया। "तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया" — ज्ञान को प्रणाम, प्रश्न और सेवा से प्राप्त करो।

मुख्य विषय-बिन्दु
अवतार का रहस्यधर्म-संस्थापनाज्ञान-यज्ञगुरु-शरणागतिनैष्कर्म्यसिद्धि
मुख्य शिक्षा

ज्ञान सबसे बड़ी नाव है जो पाप-सागर से पार ले जाती है। गुरु से विनम्रता, जिज्ञासा और सेवा-भाव से ज्ञान प्राप्त करो।

कर्म-संन्यास और कर्मयोग — दोनों मोक्ष के मार्ग हैं। परन्तु कर्मयोग श्रेयस्कर है। ब्रह्मनिर्वाण की प्राप्ति का मार्ग यहाँ वर्णित है।
श्लोक२९ श्लोक
मुख्य विषयकर्म-संन्यास
लक्ष्यब्रह्मनिर्वाण
तुलनासमदर्शिता
प्रमुख श्लोक
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥

जो व्यक्ति आसक्ति त्यागकर ब्रह्म को समर्पित करके कर्म करता है, वह पाप से उसी प्रकार लिप्त नहीं होता जैसे कमल का पत्ता जल से नहीं भीगता।

— गीता ५.१०

भगवान ने बताया — ज्ञानी व्यक्ति जो सब में एक ही ब्रह्म को देखता है, वह ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल को समान दृष्टि से देखता है। यही सम-दर्शन है। ऐसा व्यक्ति जीते जी ही मुक्त हो जाता है।

मुख्य विषय-बिन्दु
कर्मयोग की श्रेष्ठतासमदर्शिताब्रह्मनिर्वाणजीवन्मुक्तिइन्द्रिय-संयम
मुख्य शिक्षा

कमल-पत्र की भाँति जल में रहते हुए भी जल से अलिप्त रहना — यही जीवन-कला है। संसार में रहकर संसार से अनासक्त रहो।

ध्यान-योग का सम्पूर्ण विज्ञान — आसन, प्राणायाम, मन की एकाग्रता और समाधि की विधि। मन को वश में करना ही सबसे बड़ा योग है।
श्लोक४७ श्लोक
मुख्य विषयध्यान-योग
विधिआसन-ध्यान
श्रेष्ठभक्त-योगी
प्रमुख श्लोक
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥

मनुष्य को अपने आप से अपना उद्धार करना चाहिए, अपने को अधोगति में नहीं डालना चाहिए। यह आत्मा ही अपना मित्र है और यह आत्मा ही अपना शत्रु भी है।

— गीता ६.५

भगवान ने ध्यान की विस्तृत विधि बतायी — एकान्त स्थान, कुश-आसन, सीधी पीठ, आँखें नासाग्र पर। अभ्यास और वैराग्य से मन को वश में करना संभव है। अर्जुन ने पूछा — "मन तो वायु के समान चञ्चल है।" भगवान ने कहा — "अभ्यास और वैराग्य से इसे वश किया जा सकता है।"

मुख्य विषय-बिन्दु
ध्यान की विधिमन-संयमअभ्यास-वैराग्यसमाधिश्रेष्ठ भक्त-योगी
मुख्य शिक्षा

तुम्हीं अपने मित्र हो और तुम्हीं अपने शत्रु। जो मन को जीत लेता है, उसके लिए मन मित्र बन जाता है। मन की साधना ही सबसे बड़ी साधना है।

भगवान ने अपनी परा और अपरा प्रकृति का वर्णन किया। सम्पूर्ण सृष्टि उन्हीं में है। माया की महिमा और जिज्ञासु भक्तों के चार प्रकार बताये।
श्लोक३० श्लोक
मुख्यपरा-अपरा
भक्तचार प्रकार
मायात्रिगुणमयी
प्रमुख श्लोक
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥

हजारों मनुष्यों में कोई एक ही सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है और उन प्रयत्न करने वालों में भी कोई एक ही मुझे तत्त्वतः जानता है।

— गीता ७.३

भगवान ने बताया कि उनकी प्रकृति दो प्रकार की है — अपरा (जड़): पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, अहंकार। परा (चेतन): जीवन-शक्ति जो सृष्टि को धारण करती है। सम्पूर्ण जगत् इन्हीं दोनों प्रकृतियों का संयोग है।

चार प्रकार के भक्त — आर्त (दुःखी), जिज्ञासु (जानना चाहने वाला), अर्थार्थी (धन चाहने वाला), ज्ञानी (तत्त्वज्ञाता)। इनमें ज्ञानी भक्त सर्वश्रेष्ठ है।

मुख्य विषय-बिन्दु
परा-अपरा प्रकृतित्रिगुणमयी मायाचार प्रकार के भक्तज्ञानी भक्त की श्रेष्ठता
मुख्य शिक्षा

सम्पूर्ण सृष्टि में एकमात्र भगवान हैं — सोने में स्वर्णत्व की भाँति। जो इस एकत्व को जान लेता है, वह मुक्त हो जाता है।

मृत्यु के समय क्या स्मरण करना चाहिए? शुक्ल-कृष्ण गति का रहस्य, ओंकार की महिमा और परमधाम का मार्ग यहाँ वर्णित है।
श्लोक२८ श्लोक
मुख्यओंकार-ध्यान
मार्गशुक्ल-कृष्ण गति
धामपरमधाम
प्रमुख श्लोक
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥

जो मनुष्य अन्तकाल में मुझे ही स्मरण करते हुए शरीर का त्याग करता है, वह मेरे भाव को प्राप्त होता है — इसमें कोई सन्देह नहीं।

— गीता ८.५

भगवान ने कहा — अन्त समय में जो भाव होता है, उसी के अनुसार अगला जन्म होता है। इसलिए जीवनभर भगवान का स्मरण करते रहो ताकि अन्त में भी वही याद रहे। ओंकार () एकाक्षर ब्रह्म है — इसका जप करते हुए शरीर त्यागने से परमगति मिलती है।

मुख्य विषय-बिन्दु
ओंकार की महिमाअन्तकाल का स्मरणशुक्ल-कृष्ण गतिब्रह्मलोकपरमधाम
मुख्य शिक्षा

जीवन भर अभ्यास करो — फिर अन्त समय में भी वही याद रहेगा। जो जीवनभर ईश्वर को याद करता है, वह मृत्यु के क्षण में भी ईश्वर को ही याद करता है।

यह समस्त ज्ञानों का राजा है — सर्वाधिक गोपनीय। भगवान ने पत्र-पुष्प-फल-जल से भक्ति की महिमा बतायी। यहाँ सबसे सुन्दर भक्ति-श्लोक हैं।
श्लोक३४ श्लोक
महत्वराजविद्या
भक्तिपत्र-पुष्प
वचनयोगक्षेम
प्रमुख श्लोक
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥

जो भक्त मुझे पत्ती, फूल, फल या जल श्रद्धाभक्ति से अर्पण करता है, उस शुद्ध चित्त वाले के उस भक्तिपूर्वक अर्पण को मैं स्वीकार करता हूँ।

— गीता ९.२६

भगवान ने कहा — "अनन्याश्चिन्तयन्तो मां..." — जो अनन्य भाव से मेरा ध्यान करते हैं, उनका योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ। यह भगवान का सबसे बड़ा वचन है। वे अपने भक्तों का पालन-पोषण स्वयं करते हैं।

भगवान ने यह भी कहा — "मेरी भक्ति करो, मुझे प्रणाम करो, मेरे लिए सब कुछ करो — इस प्रकार तुम मुझे ही प्राप्त होगे।" यहाँ सबसे सरल और सबसे श्रेष्ठ भक्ति-मार्ग का वर्णन है।

मुख्य विषय-बिन्दु
राजविद्या-राजगुह्यपत्र-पुष्प भक्तिअनन्य-भक्तियोगक्षेम का वचनसर्वधर्म-समभाव
मुख्य शिक्षा

भगवान को किसी बड़ी भेंट की आवश्यकता नहीं — एक पत्ती, एक फूल, एक फल या केवल जल भी यदि प्रेम से चढ़ाओ, तो भगवान प्रसन्नता से स्वीकार करते हैं।

भगवान ने अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन किया — देवताओं, ऋषियों, नदियों, पहाड़ों, वृक्षों आदि में वे अपनी श्रेष्ठ विभूति हैं।
श्लोक४२ श्लोक
मुख्यविभूतियाँ
दृष्टिसर्वत्र ईश्वर
श्रेष्ठमैं हूँ वह
प्रमुख श्लोक
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥

जो-जो विभूतियुक्त, श्रीसम्पन्न और बलशाली वस्तुएं हैं, उन-उन सबको तुम मेरे तेज के अंश से उत्पन्न जानो।

— गीता १०.४१

भगवान ने अपनी ५५ से अधिक प्रमुख विभूतियाँ बतायीं — वेदों में सामवेद, देवों में इन्द्र, नदियों में गंगा, वृक्षों में पीपल, पहाड़ों में सुमेरु, पशुओं में सिंह, पक्षियों में गरुड़, वीरों में राम, ज्ञान में अध्यात्म-विद्या। जहाँ-जहाँ श्रेष्ठता है, वहाँ-वहाँ भगवान हैं।

मुख्य विषय-बिन्दु
५५ विभूतियाँसर्वत्र भगवानतेजोऽंशविश्व-दर्शन की भूमिका
मुख्य शिक्षा

संसार में जो भी श्रेष्ठ, सुन्दर और शक्तिमान है — वह सब ईश्वर का ही अंश है। सृष्टि में सुन्दरता देखना ही भगवान को देखना है।

यह गीता का सबसे भव्य और अलौकिक अध्याय है। भगवान ने अर्जुन को दिव्य चक्षु देकर अपना विश्वरूप दिखाया — जिसमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड समाया हुआ था।
श्लोक५५ श्लोक
विशेषविश्वरूप
दृष्टिदिव्यचक्षु
अनुरोधमूल रूप दिखाओ
प्रमुख श्लोक
अर्जुन उवाच:
पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान्।

अर्जुन बोले — हे देव! मैं आपके शरीर में समस्त देवों को तथा अनेक भूत-समुदायों को देख रहा हूँ।

— गीता ११.१५

अर्जुन ने विश्वरूप देखा — असंख्य मुख, नेत्र, हाथ, आभूषण, दिव्य वस्त्र। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक स्थान पर। सूर्य-चन्द्र उनके नेत्र, सम्पूर्ण सृष्टि उनके शरीर में। अर्जुन भय और विस्मय से काँप उठे। उन्होंने भगवान से प्रार्थना की — "हे जनार्दन! मुझे अपना सौम्य चतुर्भुज रूप दिखाइये।"

मुख्य विषय-बिन्दु
विश्वरूप दर्शनदिव्य चक्षुब्रह्माण्ड का एकत्वकाल-स्वरूपचतुर्भुज रूप
मुख्य शिक्षा

भगवान का विश्वरूप सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है। परन्तु भक्ति से उनका सुन्दर मूल रूप ही प्राप्त होता है। ज्ञान से नहीं, केवल अनन्य भक्ति से ही भगवान के दर्शन होते हैं।

भक्तियोग सबसे सहज और श्रेष्ठ मार्ग है। भगवान ने अपने प्रिय भक्त के बारह गुण बताये। यह अध्याय भक्तों का सर्वाधिक प्रिय अध्याय है।
श्लोक२० श्लोक
विषयभक्तियोग
लक्षण१२ गुण
फलपरम प्रिय
प्रमुख श्लोक
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

जो किसी भी प्राणी से द्वेष नहीं करता, जो सबका मित्र और करुणावान है, जो ममता और अहंकार से रहित है, सुख-दुःख में समान रहता है और क्षमाशील है — वह मुझे प्रिय है।

— गीता १२.१३

भगवान ने सगुण (साकार) और निर्गुण (निराकार) भक्ति की तुलना करते हुए सगुण भक्ति को अधिक सुलभ बताया। प्रिय भक्त के लक्षण — किसी से द्वेष न करना, सबसे मित्रता, करुणा, ममता-अहंकार से रहित, सुख-दुःख में समभाव, सन्तुष्ट, सत्यनिष्ठ, शान्त।

मुख्य विषय-बिन्दु
सगुण-निर्गुण भक्तिप्रिय भक्त के लक्षणभक्ति का क्रमअनन्य-शरणागति
मुख्य शिक्षा

भक्ति के लिए बड़े साधनों की आवश्यकता नहीं — केवल प्रेम और शरण-भाव। जो भगवान में मन लगाता है और जगत् को समभाव से देखता है, वह भगवान को अत्यन्त प्रिय है।

क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का भेद — यही सांख्य-दर्शन का मूल है। शरीर नाशवान् है, आत्मा नित्य है। इस भेद को जानना ही मुक्ति है।
श्लोक३५ श्लोक
मुख्यक्षेत्र-क्षेत्रज्ञ
विज्ञानसांख्य-दर्शन
लक्ष्यविवेक-ज्ञान
प्रमुख श्लोक
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥

हे भारत! सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ (जाननेवाला) भी मुझे ही जानो। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का ज्ञान ही मेरे मत में सच्चा ज्ञान है।

— गीता १३.२

भगवान ने शरीर को क्षेत्र (खेत की भाँति) और आत्मा को क्षेत्रज्ञ (खेत का जाननेवाला) कहा। शरीर में पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त, दस इन्द्रियाँ, मन, इन्द्रिय-विषय, इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल-चेतना — ये सब क्षेत्र के अंग हैं।

मुख्य विषय-बिन्दु
क्षेत्र का स्वरूपक्षेत्रज्ञ = आत्माविवेक-ज्ञानप्रकृति-पुरुषमुक्ति का मार्ग
मुख्य शिक्षा

जो यह जान लेता है कि "मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ" — वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है। यही विवेक-ज्ञान है।

प्रकृति के तीन गुण — सत्व, रज और तम — इनसे बंधन होता है। इन्हें जानकर और इनसे परे होकर ही मुक्ति मिलती है। गुणातीत की पहचान यहाँ वर्णित है।
श्लोक२७ श्लोक
मुख्यत्रिगुण
लक्ष्यगुणातीत
तुलनासत्व श्रेष्ठ
प्रमुख श्लोक
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत॥

हे भारत! सत्व गुण सुख में आसक्त करता है, रज कर्म में और तम ज्ञान को ढककर प्रमाद (आलस्य) में आसक्त करता है।

— गीता १४.९

सत्व — शुद्धता, ज्ञान, सुख, प्रकाश। रज — इच्छा, कर्म, लगाव, अशान्ति। तम — अज्ञान, आलस्य, भ्रम, मूढ़ता। तीनों गुण मिलकर आत्मा को बांधते हैं। जो इन तीनों से परे हो जाता है, वह गुणातीत है — वही मुक्त है।

मुख्य विषय-बिन्दु
सत्व-रज-तम का स्वभावबन्धन का कारणगुणातीत के लक्षणभक्ति से मुक्ति
मुख्य शिक्षा

तीनों गुण माया के जाल हैं। पहले तमस् से रजस् में, फिर रजस् से सत्व में उठो — और फिर सत्व से भी परे जाओ। अनन्य भक्ति ही त्रिगुणों से पार ले जाती है।

संसार-वृक्ष (अश्वत्थ) का अद्भुत वर्णन। भगवान ने तीन पुरुषों — क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम — का रहस्य बताया। वे स्वयं पुरुषोत्तम हैं।
श्लोक२० श्लोक
प्रतीकअश्वत्थ वृक्ष
तीनक्षर-अक्षर-पुरुषोत्तम
श्रेष्ठपुरुषोत्तम
प्रमुख श्लोक
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥

हे भारत! जो मोहरहित पुरुष मुझे इस प्रकार पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ है और सर्वभाव से मेरी भक्ति करता है।

— गीता १५.१९

भगवान ने संसार की उपमा अश्वत्थ वृक्ष (पीपल) से दी — जिसकी जड़ ऊपर (ब्रह्म में) और शाखाएँ नीचे (संसार में) हैं। इस वृक्ष को वैराग्य-रूपी शस्त्र से काटकर उस परमधाम को प्राप्त करना चाहिए जहाँ से लौटना नहीं होता।

मुख्य विषय-बिन्दु
अश्वत्थ का प्रतीकक्षर-अक्षर पुरुषपुरुषोत्तम तत्वपरमधाम
मुख्य शिक्षा

संसार-वृक्ष की जड़ें ऊपर हैं — परमात्मा में। जो इस सत्य को जान लेता है और संसार की आसक्ति काट देता है, वह परमगति को प्राप्त होता है।

दैवी और आसुरी सम्पदा — दो प्रकार के स्वभाव। दैवी गुण मुक्ति देते हैं, आसुरी गुण बन्धन में डालते हैं। काम, क्रोध और लोभ — ये तीन नरक के द्वार हैं।
श्लोक२४ श्लोक
मुख्यदैवी-आसुरी
नरकद्वारकाम-क्रोध-लोभ
आधारशास्त्र-विधान
प्रमुख श्लोक
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥

काम, क्रोध और लोभ — ये तीन नरक के द्वार हैं जो आत्मा का नाश करते हैं। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

— गीता १६.२१

दैवी सम्पदा के २६ गुण — अभय, शुद्धता, ज्ञान, दान, दम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शान्ति, परनिन्दा-विरक्ति, करुणा, लोभहीनता, कोमलता, लज्जा, स्थिरता, तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, मानापमान में समभाव। आसुरी सम्पदा — दम्भ, अभिमान, क्रोध, कठोरता, अज्ञान।

मुख्य विषय-बिन्दु
२६ दैवी गुणआसुरी स्वभावतीन नरक-द्वारशास्त्र-प्रमाण
मुख्य शिक्षा

काम, क्रोध और लोभ — ये तीन महाशत्रु हैं। इन्हें जीतो। दैवी गुणों का विकास करो — यही मनुष्य का सर्वोत्तम धर्म है।

श्रद्धा, आहार, यज्ञ, तप और दान — इन पाँचों के तीन-तीन प्रकार गुणों के अनुसार बताये। "ॐ तत् सत्" — यह त्रिविध नाम ब्रह्म का प्रतीक है।
श्लोक२८ श्लोक
मुख्यत्रिविध श्रद्धा
आहारसात्विक श्रेष्ठ
मन्त्रॐ तत् सत्
प्रमुख श्लोक
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥

हे भारत! प्रत्येक मनुष्य की श्रद्धा उसके स्वभाव के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है — जो जैसी श्रद्धा रखता है, वह वैसा ही बन जाता है।

— गीता १७.३

तीन प्रकार की श्रद्धा — सात्विक: देवताओं की पूजा। राजसिक: यक्ष-राक्षसों की पूजा। तामसिक: भूत-प्रेतों की पूजा। तीन प्रकार का आहार — सात्विक (आयु, बुद्धि, बल वर्धक), राजसिक (दुःख-शोक देने वाला), तामसिक (अर्द्ध-पका, अपवित्र)।

मुख्य विषय-बिन्दु
त्रिविध श्रद्धात्रिविध आहारत्रिविध यज्ञत्रिविध दानॐ तत् सत्
मुख्य शिक्षा

मनुष्य वही बनता है जिसमें उसकी श्रद्धा होती है। सात्विक श्रद्धा, सात्विक आहार और सात्विक कर्म ही जीवन को उन्नत बनाते हैं।

यह गीता का सबसे महत्वपूर्ण और विस्तृत अध्याय है। इसमें त्याग, ज्ञान, कर्म, भक्ति — सबका समन्वय है। अन्त में भगवान का परम गोपनीय वचन — "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।"
श्लोक७८ श्लोक
विशेषगीता का सार
परम वचनशरणागति
फलपरम मोक्ष
गीता का परम वचन
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥

सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत कर।

— गीता १८.६६ (चरम श्लोक)
अध्याय का विस्तृत विवरण

इस अध्याय में भगवान ने सम्पूर्ण गीता का सार प्रस्तुत किया। त्याग और संन्यास का भेद बताया — संन्यास (काम्य कर्मों का त्याग) और त्याग (फल की आसक्ति का त्याग)। फल की आसक्ति छोड़कर कर्म करना ही सच्चा त्याग है।

भगवान ने ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख — इन सबके तीन-तीन प्रकार बताये। इसके बाद परम गोपनीय उपदेश दिया — "मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मुझे पूजो, मुझे प्रणाम करो — इस प्रकार तुम मुझे ही प्राप्त होगे।"

अन्त में संजय ने धृतराष्ट्र से कहा — जहाँ योगेश्वर कृष्ण और धनुर्धारी अर्जुन हैं, वहाँ श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है। अर्जुन ने कहा — "करिष्ये वचनं तव" — आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।

मुख्य विषय-बिन्दु
संन्यास-त्याग का भेदत्रिविध ज्ञान-कर्मवर्णाश्रम-धर्मपरमगोपनीय वचनशरणागतिमोक्ष-प्राप्ति
अठारहवाँ अध्याय — गीता का उपसंहार

श्लोक १८.६६ को "चरम श्लोक" (The Final Verse) कहा जाता है। यह भगवान का सबसे उदात्त और सर्वोच्च वचन है। यह श्लोक सम्पूर्ण गीता का "बीज-श्लोक" है — जिसमें सम्पूर्ण गीता-दर्शन समाया है।

गीता की परम शिक्षा

सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। — सब कुछ छोड़कर केवल भगवान की शरण लो। यह न कर्म का त्याग है, न समाज का — यह अहंकार का, "मैं करता हूँ" इस भाव का त्याग है। इस शरणागति में ही मोक्ष है।